जान है जिस्म में मगर बे-जान सा क्यूं है
यहां के हर लोग परेशान सा क्यूं है।
हर किसी के पास तो कोहिनूर हुआ नहीं करता
फिर लग रहा हमें हुआ नुकसान सा क्यूं है।
हमने तो उनसे उम्मीद कर दुनिया नहीं बसाई
आज़ वो मुजपर इतना मेहरबान सा क्यूं है।
क्या कोई नई बात नज़र आती है मेरे चेहरे में
आइना मुझे देख कर अब हैरान सा क्यूं है।
हमें न फ़िक्र है किसी की न है ग़म कोई
महफ़िल-ए-जश्न में आखिर बंद ज़ुबान सा क्यूं है।
दिल है गर तो धड़कने का कोई न कोई मसला होगा
इसमें इतना तू हो रहा अनुराग परेशान सा क्यूं है।
©anuragrahi
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