जाने होगा अनुराग तू होशियार कब
औरों ने लुट ली पता नहीं बहार कब।
मलते हैं हाथ दोनों रोज़ इक अनार के लिए
देखिए आता है उनके जोबन में उभार कब।
जो बड़े बड़े है बस हक़ है उनका बाम पर
महफ़िल में गरीब को मिलता है सत्कार कब।
जब माल नक्द तुने दिया हमने नक्द-ए-दिल
साकी हमें बता दें पि थी हमने उधार कब।
मेरी उम्मीद तो उनपे कभी ना-उम्मीद न हुई
पर दुश्मन के हो गए हैं वो जाने यार कब।
इक दिन सामने से उठ जाएंगे हम तेरे देखना
चिल्लाती रह जाओगी कि न किया तुमसे प्यार कब।
©anuragrahi
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