जैसे आस्मां के टुटे तारों को जोड़ा जा नहीं सकता
मैं इस कदर बिखरा हूं कि पिरोया जा नहीं सकता।
अब जज्बातों को दफन करना ही जायज है
जब उनसे अदाब-सलाम किया जा नहीं सकता।
अभी तक संभाले हुए थे दिल को सब्र के सहारे
हाल क्या होगा अब बताया जा नहीं सकता।
कई नज्म लिख दिए हैं प्यार के लिखने वालों ने
बेरूखी ऐसी कि दो अल्फाज़ लिखा जा नहीं सकता।
दरबार-ए-हुस्न में वां मुझ फकीर का क्या काम
ताजमहल तो मुझसे दिया जा नहीं सकता।
रिश्ता-ए-दिल तोड़ कर मुझसे सुकून होगा तुम्हें
अनुराग से तो तन्हा जिंदा रहा जा नहीं सकता ।
©anuragrahi
S