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जब आदत तड़पने की जिस्म को लग गई है फिर रूह से तड़पन को न अलग करना मेरे चाहने…

जब आदत तड़पने की जिस्म को लग गई है

फिर रूह से तड़पन को न अलग करना

मेरे चाहने वालों मेरे जिस्म को जलाने के बाद

इबादत मेरे तस्वीर का न कभी करना

वह चला जाएगा जहाँ से कोई लौटा नहीं करता

उसे शरीक अपने खुशी में करने को खुदा खुदा न करना

मुसलसल तैयार है हर बाप अपने जिम्मेदारीयों के खातिर

हमने वो पूरा नहीं किया किसी से गिला न करना

कश्ती कागज़ की कभी दरिया पार नहीं कराती

मुझ जैसे किसी गरीब से कभी दोस्ती न करना।