जब एक लड़की घर छोड़ती है,
तो वह सिर्फ़ घर नहीं छोड़ती।
वह छोड़ती है अपना बचपन,
अपनी सारी मासूमियत,
अपने नाज़-नखरे, अपना अल्हड़पन,
अपनी सादगी और अपना भोलापन।
वह पीछे छोड़ जाती है
अपनी बेबाक हँसी, अपनी पहचान,
वह दुनिया जहाँ उसे खुलकर बोलने की आज़ादी होती है,
जहाँ उसकी राय के मायने होते हैं।
वह सब कुछ छोड़ जाती है
किसी अनजान घरौंदे को सँवारने के लिए,
अपना ही घरौंदा तोड़कर।
और फिर वह बन जाती है
किसी और के पिंजरे की एक चुप-सी चिड़िया,
जिसे कभी गूँगी, कभी बेगानी,
कभी नासमझ और कभी बेवकूफ़ कह दिया जाता है।
कई बार उस पिंजरे में
उससे सिर्फ़ उसकी आज़ादी ही नहीं,
उसका अस्तित्व भी छीन लिया जाता है।
और फिर उसे छोड़ दिया जाता है
अपनी ही खामोशियों में तड़पने के लिए।
फिर भी वह जीती है,
टूटकर भी रिश्तों को जोड़ती है,
बिखरकर भी घर बसाती है—
क्योंकि वह एक लड़की है।
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