जब हो न आसरा न साथ तो मेरे घर पे आ जाना
मिलती है यहाँ शकुन-ए-हयात मेरे घर पे आ जाना।
हो वादिया खामोश गर हो तन्हाई का आलम
दिल में लिए सभी जज्बात मेरे घर पे आ जाना ।
है कफस में मेरी रूह तेरे जिस्म ओ जिगर में
जिंदगी हो गई जिना दुसवार मेरे घर पे आ जाना।
जब सामने गर तू रहो क्यों तमन्ना जन्नत की हो
है ये दिल तेरा तलबगार मेरे घर पे आ जाना।
हमने लगाई वज्म यहां तुझे बुलाने के लिए मगर
न खत है न कोई जबाब है मेरे घर पे आ जाना।
है कसक अजब सी एक,इस अनुराग के जेहन में
जाने क्यों वो कलाई है अभी याद मेरे घर पे आ जाना।
©anuragrahi
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