जब जिंदगी खामोश हो जाए
फिर खुद से जुस्तजू किया जाए।
किसी और का नहीं फकत अपने
विचारों पर ही गुफ्तगू किया जाए।
यहां कोई नहीं समझने वाला
फिर क्यूं किसी से आरजू किया जाए।
अपने फटे चिथड़े दिल को
वक्त के धागों से रफू किया जाए।
कफ़स में कैद परिंदों की तरह
रिश्ता-ए-दिल पर काबू किया जाए।
बहुत सहे सितम हमनें सितमगर के
सवाल उसी लहजे में हूबहू किया जाए।
अपनों का क्या कौन कहाँ कब पलट जाए
गैरों से ही वस्ल-ए-लहूं किया जाए।
मरहले में अभी तारिक फैली होगी अनुराग
चलो अब रौशन-ए-जूगनू किया जाए।
©anuragrahi
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