जब निभाना ही नही होता साथ तो झूठा प्यार
जताते क्यों हो
जब नही ही करनी थी बात तो अपने जज़्बात
बताते क्यों हो
जब छुड़ाना ही होता है हाथ तो झूठा साथ
निभाते क्यों हो
जब संभाल ही नही सकते हालात तो ऐसे हालात
बनाते क्यों हो
जब खुद ही नही रो सकते सारी-सारी रात तो दुसरो
रुलाते क्यों हो
जब खेल ही नही सकते खेल इश्क़ का तो खुद को
दांव पर लगाते क्यों हो
जब सच बोलने और सुंनने से इतना ही डरते हो तो खुद
को सच्चा इंसा बताते क्यों हो
जब किसी की आँख के आंशु ही नही पोंछ सकते तो दुसरो की
आँख में आंशु लाते ही क्यो हो
©deepakshar
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