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जब लागे बालम से नेह हमारी ।

जब लागे बालम से नेह हमारी
का जाउं मैं द्वार महतारी।
बाबुल की तो मैं ठहरी दुलारी
पिया संग तो मैं मन को हारी।
बचपन गुजारी उ होई पराई
अंजानो से अब रिश्ता हमारी।
बाबुल घर मैं कहीं नांचू फीरूं
पिया घर बाहर पांव न रखूं बेचारी।
बचपन की सब छुटी सखी-सहेली
चौका बेलन बनी अब सखी मारी।
कनक पिजड़े में भी मैना रोय
ये न थी कबहुं दुनिया हमारी।
©anuragrahi