जब तक न उतरो समंदर में तैरना न आएगा
फकत ख्वाहिशें रखने से हाथ मोती न आएगा।
आजमाइशों में तो अक्सर शिकस्त मिलती रहती है
बगैर शिकस्त खाए कभी जीतना न आएगा।
तुम्हारी जुल्फें जो बिखरी काली घटा सी है
बिन मुझे याद किए उसे संवरना न आएगा।
आज मैं खुद से शिखर से उतर गया हूं जरूर
मगर दुबारा बिन तेरे मुझे चढना न आएगा।
दाखिला ले चुका हूं सिखने को इश्क़ की तहजीब
फलसफा इश्क़ की किसी और से समझना न आएगा।
बंद करो लिखना अब ग़ज़ल गम-ए-इश्क़ का अनुराग
तेरे दिल को इस जमाने को कभी पढना न आएगा।
©anuragrahi
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