जेठ का अंतर्दाह
पवन पूरे वेग में,
लिए आर्द्रता और धूल को,
बिछा शुष्कता की परत,
गाए रौद्र के परोल को।
मरीचिका मेघ की,
मन मौज से परिपूर्ण कर,
ले पटक दिया यथार्थ में,
ताप के तरंग पर।
यह तपन त्वचा की कुछ नहीं,
समक्ष अंतर्दाह के,
ज्वलंत इस आत्मा से,
प्रकट हुई चाह के—
चंद बूँद शीतल नीर की,
सूर्य तेज न मिटा सके,
कुछ क्षण हर्षोल्लास के,
संत्रास ना घटा सके।
कर माँग सरल सवाल का,
जटिल जवाब हाथ आएगा,
अशांत मन की कोख से,
दुखद रोग ही आएगा।
यह दुख का ताप है,
धरा से भाप बन निकल रहा,
इस जेठ के मास में,
मन जलता हुआ भटक रहा।