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" जगन्माता "

"म" में आ की मात्रा ,
है ये ममत्वता की यात्रा!
जिन्होंने एक पुंज से बनाया ये तन का निकुंज !
जिनका साया प्रकृति की हर कोर में समाया !
जिनके ओज पर आधारित हैं जड़ता का भोज !
जो है जग की जगन्माता !
है जो वास्तविक अधिष्ठाता !
जिनसे परे है लिंगभेद की गाथा !
जिनके आंचल में पलकर भी मन जब ,
माँ को है कुछ क्षण के लिए भूल है जाता ,
तो होती हैं हृदय में गहन सी चुभन,
और मन करने लगता है अत्यंतता से रुदन !
जब मिलाता है तन मुर्तिमय माँ से नयन ,
तो होता है नैनो का धरा से धारमय मिलन !
धीमे धीमे थकते नयन करते हैं ,
उनके आंचल में शयन !
होती हैं जहाँ समर्पण की वार्ता गहन !
और माँ के चरणों में झुक जाता है
अस्तित्व का हर जर्रात्मक जहन !!
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