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जिगसॉ नज़्म

एक मिसरा अधूरी नज़्म का-
रेंगता है बदन में|
वही मिसरा जिसे,
लपेट के ठंडी सरगोशियों में
तुमने फूंका था मीरे लबों तले|
पकडूँ तो फिसले जैसे कोई-
साबूनी टिकिया हाथों से छूटे...
और कुरेद दे गला गर
ज़ुबाँ तक पहोंच जाये-
सांस लेना ना बने, ना ही सांस छूटे|
तूम पी लो एक और चांदनी-
के इस बार सियाही कम न हो|
रोक के साँसे मैंने,रक्खा है होटों पे
नज़्म के उस बेचारे मिसरे को!
by Gaurav Rathod
©gauravr