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जीने दे..

मधुयामिनी में..हे गजगामिनी
मुझे जी भर के जीने दे
सौष्ठव कंचन तेरी काया का
यौवन रस छक कर पीने दे....
श्रृंगार तेरा खींचे है मुझे
नयन कटार रीझे है मुझे
कमरधनी की मृदुल हंसी
कंगनों की तालबद्ध खुशी
हंसी खुशी के क्षण से अपने
श्वांस आस सीने दे....
यौवन रस छक कर पीने दे....
होठों की ये कोमल कलियां
आग छुपाए कोमल अंगिया
चाल है मादक अदा है कातिल
डूबे को पहुंचा दे तू साहिल
जेठ की तपती हो दोपहरी
या सावन मदमस्त सी लहरी
हर रूत में यूं हीं मिलने दे.....
यौवन रस छक कर पीने दे...
तेरे बिन नहीं कर सकता कल्पना
तू हीं मेरी प्यास तू ही है साधना
तेरे यौवन से जब भी टकराया मेरा यौवन
दिल में उठे तूफान खिल उठा मनसावन
तुझसे दिन होता है शुरू तो रात होती मतवाली
तू मेरे यौवन की पूरक..मैं कितना सौभाग्यशाली
युगों युगों की प्यास को मेरी बुझने दे....
यौवन रस छक कर पीने दे.....
तुझको पाकर धन्य हुआ हूं
मादकता में मूर्धन्य हुआ हूं
सान्निध्य तेरा एहसास कराता रब का
तुझको पाकर दिल हो जाता रब का
नूर खुदा का रखकर दिल में
जीवन को मेरे जलने दे......
यौवन रस छक कर पीने दे....
©abhidilse