बचपन में किसी बेहतर गुरु की तलाश करते थे....
हर गुरु के भीतर मन को निहार कर सीखने की चाह लेकर लौट आया करते थे.....
किसी दिन अचानक एक व्यक्ति से मुलाकात हुई जो उम्र के कई पड़ाव को पार कर भी सिखाने में अपना जुनून दिखाया करते थे.....
हमें भीतर से मजबूत इरादों का पाठ पढ़ा कर हमारी कमियों से हमें अवगत कराया करते थे....
अपने बच्चों की भांति हमें भी डांट लगाया करते थे....
अपने शरीर की कमजोरी पर ध्यान रखते हुए भावो से ही हमें गुरु का ज्ञान दिया करते थे.....
हमारे जीवन में अपनी सरलता का पहलू सजाया करते थे.....
शत शत नमन है उनको जिनका जीवंत व्यवहार उनसे मुलाकातों के बिछड़े संसार में भी हमारे भीतर विचरण करते थे.....
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