कायनात की सलामती में इंसान करवटें बदलता है
तकलीफों के मंजर से हर रोज वो गुजरता है
और मुस्कुराहट को भूलकर ,भीतर से ही सिकुड़ता है
हर क्षण में बहते प्राण से तू क्यों नहीं खिलता है
तुझे खिलाने के लिए ही तो सूरज यहां निकलता है
निश्चित स्त्रोत में ही क्यों मुस्कुराहट की खोज करता है
जहां हर पहर ही मुस्कुराहट के दामन से निखरता है
ना जाने तू क्यों परिस्थितियों के टुकड़ों में बिखरता है जबकि हृदय को अवगत है कि तू संजोने से ही सवॅरता है ईश्वर के आंचल में पल कर भी प्रेम की तलाश करता है
जबकि प्रेम बांटने के लिए ही तेरी ईश्वर उत्पत्ति करता है।
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