मौत तो मुकद्दर है, जिंदगी से क्यो डरो
जिंदगी मे दुख तो निश्चित है, दुख से क्यो डरो
सुख के पल चार, दुख के हज़ार
मौत तो मुकद्दर है, जिंदगी से क्यो डरो
सुख रास नही, दुख की आस नही
जो उसके पास है वो उसे रास नही
जो उसे खोना है, उसे उसकी आस नही
जो उसके पास हैं, उसे उसकी रास नही
जिंदगी एक खूबसूरत सा अल्फाज़ है
उस अल्फाज़ का एक निराला सा अंदाज है
कुदरत ने दी है जिंदगी तम्हे जीने के लिए
फिर तम्हे मरने की क्यो आस है
जिंदगी मे आए रोते हुए, माँ को हँसाते हुए
माँ जीती रही तुमको हँसता देख कर
खुद रोई तुमको हंसाया, हँसते हँसते जीना सिखाया
भूल गए हंसना वक़्त के हालात मे
छोड़ दी जिंदगी बेबसी लाचार मे
गम याद करके न जीता जिंदगी
गम भुला के सही से जीता जिंदगी
बनता प्रेरणा, सीखाता जीना जिंदगी
गम से तैर कर, दुख को चिर कर
सुख के पलों को छिनकर जीता जिंदगी
गमो को भुलाकर तुझे पाला मेरे दोस्त
कई आंसू बहाकर तुझे हंसाया मेरे दोस्त
जिंदगी तेरी नही उस माँ की देन है
ग़म में मौत को नही माँ को गले लगाता मेरे दोस्त
©chauhan
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