जिंदगी विरान सी हो गयी.
खुद में खुद की पहचान खो गयी.
न चाह के भी हम से भुल हो गयी.
खुद ब खुद जिंदगी में विष घुल गयी.
ऐन वक्त पे मेरी सुक्ष बुक्ष खो गयी.
कहना था नहीं पर हा कह गयी.
अगर किया होता दील से फैसला.
तो कभी न टुटता मेरा दील का हौसला.
ये किस कर्म का सजा मिल गया.
घुट घुट के जिने का दवा मिल गया.
©amrendraku
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