जिंदगी बेरहम होती जा रही है
साथ अपनों से छुटती जा रही है।
कासिदाने-दिल ने दिल से तार जोड़ा
मगर मिजाज़-ए-महबूब रूठती जा रही है।
मिल की पत्थरों ने सफर में ये समझाया
मेरी तरह हर पल जिंदगी कम होती जा रही है।
जब देर शाम घर आया तो ये देखा
चहूं ओर तारिक फैलती जा रही है।
फिर बाजार में खुद को बेचने जब आया
तो पाया हर रोज़ किमत घटती जा रही है।
©anuragrahi
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