विधान के कपाट पर वक्त के ललाट पर
कर्म रूपी कलम से पसीने की स्याही से
हर रोज़ रोज़ का हिसाब लिखते रहे
जिंदगी गुजर गई हिसाब लिखते रहे ।
कभी गगन के छांव में कभी पिपल के पांव में
एकाग्रचित में बैठकर चुंदरी ख्वाब की ओढ़कर
जबाव हर सवाल का जबाव ढूंढते रहे
जिंदगी गुजर गई हिसाब लिखते रहे ।
जीत के पंक्षी दुर गर हार इतना नजदीक क्यों
शुरू हुई थी ये राह तो, किसी ठोस जगह से ही
फिर मंजिल से दुर क्यों हर रोज़ हम पिछड़ते रहे
जिंदगी गुजर गई हिसाब लिखते रहे ।
कहते है हर कर्मवीर यहां पहले से लिखा कुछ नहीं
कभी किसी को नहीं मिला किस्मत से ज्यादा कुछ नहीं
क्या गलत है क्या सही अफसोस यही समझते रहे
जिंदगी गुजर गई हिसाब लिखते रहे ।
अनुभव की वो हर सीढियाँ पार हमनें कर ली
गुण अवगुण इस दुनिया के अपने दिल में भर ली
बस जिंदगी मिशाल हो भ्रम की ये खाक छानते रहे
जिंदगी गुजर गई हिसाब लिखते रहे ।
©anuragrahi
S