ज़िन्दगी जीने का कोई मन नहीं रहा,
लहज़े में उसके अपना पन नहीं रहा।
चुपके चुपके रात को रोता हूँ इसलिए,
तन्हाइयों से लड़ने का फ़न नहीं रहा।
देखे तो सही कोई,मैं खुली किताब हूँ,
मेरे दिल में कभी कालापन नहीं रहा।
वो समझे ही नहीं अलग बात है मगर,
मेरे चेहरे में कोई दोहरापन नहीं रहा।
वक़्त की आंधी में बिखरती चली गईं,
एक भी हसरत में ठहरापन नहीं रहा।
झूलों से मुंह फेरना पड़ गया इसलिए,
मेरी ज़िन्दगी में अब सावन नहीं रहा।
वो किसी के ख़्वाब में खोया था मगर,
मेरे मिलने में कोई अधूरापन नहीं रहा।
ज़लालत ने बेशक जज़्बात मार डाले,
मगर मेरे कानों में बहरापन नहीं रहा।
धूप उतर कर आए किस तरह,
घरबार के बंटवारे में आंगन नहीं रहा।
©maahisingh
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