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जिस रोज आसमाँ में!

जिस रोज आसमाँ में!

जिस    रोज़  आसमाँ  में,  चाँद  नहीं  होता,

उस रोज़, उसे चाहने वाले की, हालत तो समझ।

सितारे भी उस रोज, दिलासा नहीं बनते,

चाँद को पाने की खातिर, उसकी ये इबादत तो समझ।

खिड़की पे खड़ा रहा वो, वक्त को थामे देर तलक,

बुझी सी धड़कनों में भी, उसकी ये चाहत तो समझ।

जो आँखे ढूँढती रही, उस रोज तेरा खूबसूरत सा चेहरा,

उन आँखों के लिए, उस चेहरे की, कीमत तो समझ।

ना कोई गिला रहा किसी से, ना शिकवा हुआ खुदा से,

हासिल हुए बिना भी, मुकम्मल ये, मोहब्बत तो समझ।

हर किसी से, कुछ दर्द कहे नहीं जाते, लफ़्ज़ों में,

मगर तू किसी के, इस तरह चुप रहने की, आदत तो समझ।

ये कविता नहीं है, एक हालत है, एक दिल की,

उस दिल के इस तरह, टूट जाने की, आहट तो समझ।

जिस रोज़ आसमाँ में, चाँद नहीं होता,

उस रोज़… उसे चाहने वाले की, हालत तो समझ।

© Vishal Saini

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