जितने दिन तुम रही फक़त उन लम्हों को छोड़।
चलो अब तुम्हें नया शहर नये लोग नया यार मिलेगा
मुझसे ज्यादा फ़िक्र मंद कोई दिलदार मिलेगा
जेहा़नत है कि मुझसे सिलसिला गुफ्तगू का मुक्तसर कर
वगरना ससुराल में मेरे चलते सबों से फटकार मिलेगा
मुझ पर तरस कैसा जब मिल्कियत ही मेरी लुट गई
क्या इस ज़माने में बिन पूंजी का कोई रोजगार मिलेगा
बहुत दिल रोया नहीं सोंचा था कि इस कदर कभी
अखबार में तेरी निकाह का इश्तहार मिलेगा
अनुराग तो शायर हैं अनुराग को दो-चार कांसो के सिवा
कहां कभी क़िस्मत से किसी का प्यार मिलेगा।
जितने दिन तुम साथ रही फक़त उन लम्हों को छोड़
अनुराग के जिंदगी का हर पल बेकार मिलेगा।