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जिवन की धुरी फंसी कालचक्र में।

शादाब था ये आंगन सजी धजी खेतों की तरह
फलक से बिजली गिरी तब्दील हो गई राख की तरह।
सुर्ख लाल था ये चौखट दुल्हन की होठों के जैसी
तुफान चली तबाह कर गई एक खन्डहर की तरह।
तब्दीली आई इस तरह आब-ओ-हवा में कि मैं
बर्बाद हो गया किसी बादाकश फकीर की तरह।
हैरत में हूं कि मेरे होठों पर लर्जिस आंखों में आंसू नहीं
क्या ये सब सुख गए हैं बैशाख की तलाबों की तरह।
मेरी दुनिया भी कभी नाच रही थीं झुम रही थी
काली घटाओं में घनघोर जंगल में मोरनी की तरह।
आखिर मैं समझदार हुं फिर इतना उदास क्यों बैठा हूं
यहां पाबिलियन जाते है सब आउट खिलाड़ी की तरह।
©anuragrahi