ज़ख्म खा कर करके भी भुलाए जा रहे है हम
वो कितने अज़ीज़ है कि रोज़ पास आए जा रहे हैं हम।
निगाह मिलीं तब ही से दिल ने बसा लिया उन्हें
एक हम हैं कि उनसे शर्माएं जा रहे हैं हम।
इतने करीब आ गए हैं वो मेरे ज़मीर के मगर
बेवजह क्यूं दुरियां बढ़ाए जा रहे है हम।
इस तुफानी रात में हटा ली घुंघट पर्दानशी
आंखों आंखों की बात थी पर्दा लगाएं जा रहे हैं हम।
दिल ने नवाज़ दिया उन्हें तगमा-ए-जोहरा जबीं
और इस भोली सी सुरत से खता खाएं जा रहें हैं हम।
हुस्न-ए-मुजस्सिम गर है वो मैं भी हूं नुर-ए-मुजस्सिम
अफसोस अपनी पहचान अनुराग छुपाएं जा रहे हैं हम।
©anuragrahi
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