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" जन्नती दरवाजा '"

मन की माया में बेसुध काया है
चकाचौंध के साए ने ,
वास्तविकता को छिपाया है
ना जाने यह कैसा मोड़ आया है ,
कि जग ने बुरी भावनाओं को अपनाया है
ईश्वर का अंश जो उस में समाया है
उसने उसे कपट की अग्नि में जलाया है
निश्छल हृदय पर उसने ,
छलावे का पहरा लगाया है
जीवन की सरलता को उसने ,
सघन में जंगल में फसाया है
ईश्वर- सी करुणा का प्रसाद जो उसने पाया है
बांटने के बजाय उसे भीतर में दफनाया है
भीतर की निर्मल धारा में ,
अशुद्धियों को बहाया है
बुरी भावनाओं के चादर में जो तुमने खुद को सुलाया है अब भीतर के प्रकाश की पुकार सुनने का वक्त आया है
तु कदम बढ़ा भीतर की ओर ,
फिर देख ईश्वर ने जन्नत का दरवाजा ,
भीतर में ही बनाया है .....
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