N

जो है और नहीं भी

मेरी बाते मेरी सोच नहीं
मेरी राते कोई झूठ नहीं
वो दिन का उजाला चुभता मुझमें
पर वो दाग मेरा रूप नहीं
खिले कुसुम बहता नीर है हर दिन
जो मुरझाया और ठहरा दिखता नही
मैं हंसलू जितना साथ तुम्हारे
अंदर रोए जो मेरे वो झूठ नही
चेहरा जो दिखता रोज़ हमे वो
सच्चा हो ऐसा जरूरी नहीं
छिपे अंदर मेरे साये बन जो
न दिख पाये वो रात नहीं
मैं दिखू सुबह और शाम एक ही
पर मैं ही हूं वो सच नहीं
©namrata05