मां का काम घर और बच्चे संभालना था व पिता घर चलाने के लिए बाहर कमाने जाते थे।
तब परिवार संयुक्त हुआ करते थे।
धारणा यह थी बच्चे का छोटा मोटा काम
करना भी, मानो घर के पुरुष की मर्दानगी को
चुनौती देने जैसा था।
जो पति बच्चों को पालने में पत्नी की मदद भी करना
चाहते उन्हें जोरू का गुलाम कहा जाता था
इसलिए पिता बाज़ार से दूध तो लाते थे,
लेकिन बच्चे को पिलाने की जिम्मेदारी मां की थी
ऐसा सिर्फ इसलिए क्यूंकि एक बेटे ने अपने पिता और दादा को इसी भूमिका में देखा था।
लेकिन आज भी ये चीज पूरी तरह से नहीं बदला
सोच आज भी वही है लोगो की 40 साल पहले जैसी
कहीं ना कहीं कुछ ना कुछ देखने को मिल ही जाता है
आज जरूरत है तो अपनी सोच बदलने की।
©anusingh
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