तुम क्या समझो तुम क्या जानो बात मेरे तन्हाई की
अंगड़ाई पे अंगड़ाई कैसे लेती है रात बड़ी ये जुदाई की।
कौन शियाही घोल रहा है इस वक्त की बहती दरिया में
गीत रूहानी कौन गा रहा मेरे दर्द ए जख्म की दुहाई में।
उड़ते उड़ते आस का पंछी गहरी आसमां में डुब गया
वक्त से पहले तारें डुबकर मुझपर बहुत दनाई की।
जैसे सुरज चंदा डूबे एक दिन अनुराग सब डुब जाएगा
व्यर्थ की बातें अब छोड़ चलो ये जग है बस सौदाई की।
©anuragrahi
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