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कागज़-ए-उल्फत को कोरा न छोड़ा करो।

कागज-ए-उल्फत को कोरा न छोड़ा करो
बिच धार में लाकर यूं मुंह न मोड़ा करो।
जवां दिल है मिले दिल का कहो और दिल का सुनो
गिले-शिकवे से न यूं दिल तोड़ा करो।
शुक्रगुजार हूं कि आज एक दूसरे के बांहों में हम है
अब कभी न तुम गम की चादर ओढा करो।
मयकदों में ही होती है दर्द-ए-दिल की दवा
मगर मयकशी में न यूं तुम फिरा करो।
लिहाजा सब्र के अब कुछ नहीं बचा मेरे जिंदगी में
हिकारत भरी नजरों से न मुझे देखा करो ।
©anuragrahi