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काहे मन करेला ऐतना गुमान हो

काहे मन करेला ऐतना गुमान हो,
देखी पाईब कि नाही हमहूं बिहान हो।
सपना समान बा ज़हान के बजरिया,
सम्भर के धरऽ पांव देखी के डगरियां,
नाही बाटे कवनो ठेकान हो।
देखी पाईब कि नाही हमहूं बिहान हो।
हंसी हंसी दुनिया से बोली बतीअईह,
प्रेम के धुनवा में आज़ से सबके रमईहऽ,
ऐही खातिर तनवा में बसल बा प्राण हो।
देखी पाईब कि नाही हमहूं बिहान हो।
कबहूं समैया न रहेला एक जैसा,
दुखवा के प्रीत बाटे हमसे हो भैया,
सुखवा चिरैया के बा बहुते मकान हो।
देखी पाईब कि नाही हमहूं बिहान हो।
काहे मन करेला ऐतना गुमान हो,
देखी पाईब कि नाही हमहूं बिहान हो।
यह काव्य भोजपुरी लोकगीत के जाने माने कवि रामपति रसिया (नथुनी प्रसाद कुशवाहा)तुमकहीराज किशनगंज जिला उत्तर प्रदेश जी के अधुरे गीत को मैंने पुरा करने की कोशिश की है, उपर के पहले पधबंद इस महान कवि के है।
©anuragrahi