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काँटें मुझसे नफरत की

काँटें मुझसे नफरत की
आज हर बसर में है।
जाने क्यों ये लगता है
तन्हा हम शहर में हैं।
पहले दोपहर में जो गर्मी थी
अब यहां इस सहर में है।
मुझे न कोई कभी देखता था
नाम अब हर खबर में हैं।
उनके विसाल को तड़पता था
अब वो मेरी रहगुज़र में है।
मेरी खुशियां है रिश्ते में
उनका सुख जेवर में है।
खाक भला हम सज्जन बने
मजा दिन रात कर्र कर्र में है।
आओ हम अब कहानी बनाए
पात्र सभी तो घर में है।
मै तो विलेन हुं तू हिरो ले आओ
अगर कहीं तेरे नजर में है।
©anuragrahi