काश! जिंदगी इक किताब होती...
पढ़ सकता मैं कि आगे क्या होगा?
क्या पाऊँगा और क्या दिल खोयेगा?
मिलेगी खुशी, कब दिल रोयेगा?
काश! जिदंगी सचमुच किताब होती...
फाड़ सकता उन लम्हों को
जिन्होने मुझे रुलाया है..
जोड़ता उन पन्नो को,
जिन्होंने मुझे हँसाया है...
खोया और कितना पाया है?
हिसाब तो लगा पाता कितना
काश! जिदंगी सचमुच किताब होती...
चुराकर वक्त से आंखें पीछे चला जाता..
टूटे सपनों को फिर से सजाता,
कुछ पल के लिये मुस्कुराता,
काश! जिदंगी सचमुच किताब होती...
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©vicky
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