कैसे देखें जिंदगी में सुख के सपने
बहुत लंबी है दुख की गली मिलों तक।
अहद-ए-वाबस्तगी में नहीं लचीलापन
रूठ कर रूह चलीं दुर हमसे मिलों तक ।
बैठा है शाख पर उंची उम्मीदों के पंक्षी
छूने में वक्त है जितना चलने में मिलों तक।
राह-ए-मंजिल पे चलना तन्हा नहीं मुमकिन
हमसफ़र कोई नहीं जो संग चले मिलों तक।
रोज़ रातों को निहारना चमन के तारों को
इक बहाना है बस रहने को सपनों में मिलों तक।
जब भी निकले कहीं तो संग चलीं बिटिया की हंसी
और खुशबु देती रही नन्ही कली मिलों तक।
यूं तो आ खड़े है हम 'अनुराग' मौत के मुहाने तक
जाने क्यों ये सांसें चलीं अब तक चलीं मिलों तक।
©anuragrahi
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