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कैसे दरिंदे हो तुम? किस अधिकार से इंसान कहलाते हो तुम? तेरह बरस की मासूमियत…

कैसे दरिंदे हो तुम?

किस अधिकार से इंसान कहलाते हो तुम?
तेरह बरस की मासूमियत पर
अपनी हवस का पर्व मनाते हो तुम?
जिस उम्र में हाथों में गुड़िया होनी थी,
तुमने उसकी किस्मत में संताप लिख दिया।
जो कल तक माँ की गोद में सोती थी,
उसे जीते-जी श्मशान लिख दिया।
जिस कोख ने तुमको जन्म दिया,
उसी कोख का सम्मान भूल गए।
जिस आँचल ने तुम्हें इंसान बनाया,
उसी आँचल को तार-तार कर गए।
धिक्कार है ऐसी मर्दानगी पर,
जो अपनी वासना से हार गई।
धिक्कार है उस परवरिश पर,
जो पहली भूल पर ललकार न सकी।
सुन लो दरिंदो!
अब चूड़ियाँ कमज़ोरी नहीं,
साहस की झंकार होंगी।
अब आँखों में आँसू नहीं,
अन्याय के विरुद्ध अंगार होंगे।
अब बेटियाँ चुप नहीं रहेंगी...
वे बोलेंगी...
डटकर बोलेंगी...
और जब तक इस धरती की
हर बेटी सुरक्षित नहीं होगी...
तब तक
हर माँ की आवाज़,
हर बहन की हुंकार,
हर बेटी का स्वाभिमान...
इस देश का सबसे बड़ा रणघोष होगा!**
अब हर बेटी की आवाज़ यही होगी—

"मैं अबला नहीं, शक्ति हूँ।मैं मौन नहीं, हुंकार हूँ।जो मेरी अस्मिता पर दृष्टि उठाएगा,उसके सामने मैं न्याय की तलवारहूँ