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कैसे काटें अब दिन जालिम तन्हाई की ।

कैसे काटें अब दिन जालिम तन्हाई की
क्या मुकम्मल नहीं हुई दिन रुसवाई की।
इलाज-ए-मर्ज है तू दर्द-ए-दिल की
लाज तो रख ले तू मेरे इस दुहाई की।
हमने तो ये सोंच कर छोड़ दी तेरी गली
चराग न जलेंगे अब कभी ख़ूदाई की।
बेचारा मेरा दिल,जिद्दी मगर है बड़ा नाजुक
झेल नहीं सकेगा ग़म बेवफ़ाई की।
सच तो ये है,अनुराग तेरे बिन नहीं रह सकता
हर वक्त तलाश में हैं बस तेरी परछाई की।
©anuragrahi