कैसे रखें गुल से वास्ता होती है जब परेशानी मुझे
नफ़रत सी हो गई चिंजों से जो न है जबेदानी मुझे।
एक सहारे याद के तो जी नहीं सकता दोस्तों
अफवाहें तबाह कर रही फैली है जो बदगुमानी मुझे।
इस दश्त के शजर कहीं मोटे हैं तो कहीं पतले क्यूं
लगता है रब ने की है उनके साथ भी बेईमानी मुझे।
यहीं था कि डर मुझे मेरी इस अंजाम-ए-हालात पर
फुल जब जब हंसेंगे तो होना पड़ेगा पशेमानी मुझे।
किसने किसको दी तकल्लुफ करना नहीं जिक़्र-ए-हयात
करना है फकत अब दिल की निगाह-बानी मुझे।
पुछा फिरता था अनुराग हर एक से उल्फत के रमू़ज
याद अब रह रह कर आती है वो नादानी मुझे।
©anuragrahi
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