कौन है यहाँ सदियों तक बसर करने वाले
बनी नहीं दवा कोई लाशों पर असर करने वाले ।
तुझे श्राप है अपनी उम्र न जियो मुझे कि उम्र भर जिउं
लेकिन वो है कौन हमें यें नजर करने वाले ।
कुम्हार को अपनी मटकीयां तोड़ने का तो इरादा नहीं
वो खुदा हो ही नहीं सकता लहूं को जहर करने वाले।
मुझे ये अंदेशा है कि हो जाएंगे वो सभी मायूस
जो सिंच कर है छोटे छोटे पौधे से शजर करने वाले।
मेले के खिलौनों की तरह है इस बेजान जिस्म के कई रूप
ये रूह ही है बारी बारी से सबमें सफर करने वाले।
मेरा बस चले तो हजारों साल जिने की तुझे वर दे दूं
अफसोस मगर कोई नुस्खा नहीं बिटिया अमर करने वाले।
यह अल्फाज़ मेरी प्यारी नन्ही कैंसर पिड़ित भतिजी की याद में है जो अब इस दुनिया में नहीं रहीं, भगवान उसे प्रलोक दे।
©anuragrahi
S