सोचते – सोचते थक गया हूँ मैं,
फिर भी सोचता रहा,
लेकिन फिर भी नहीं समझ पाया कि
कौन हो तुम?
क्या भूखे के पेट की रोटी की तलाश हो तुम,
या प्यासे को पानी की तलाश हो तुम,
या फिर जिंदगी की बीती हुई यादों का अहसास हो तुम,
या बरसो बाद माँ से मिलने पर प्यार की बरसात हो तुम,
क्या शायर की शायरी का शब्द हो तुम,
या कवियों की पंक्तियों में भाव देने वाला शब्द हो तुम,
या फिर फूल की पत्तियों की सुगंध हो तुम,
या बादलों से बरसते पानी की ठंडी फुहार हो तुम,
क्या अंधेरो में जो उजाला कर दे, वो प्रकाश हो तुम,
या राहों में जो जलता है, वो महताब हो तुम,
या फिर जो सपनों मे आए , क्या वो ख्वाब हो तुम, या किसी के पूछे सवाल का जबाब हो तुम,
जिसकी ध्वनि से मन प्रसन्न हो जाए, वो शंख हो तुम?
या जो पानी और दूध को अलग करदे, वो हंस हो तुम,
या पपीहा जिस बूंद के लिए वर्षों प्यासा रहता है, क्या वो स्वाती हो तुम,
छिपे है तुम्हारे चेहरे में कई राज, क्या वो नकाब हो तुम,
जो हर टूटे दिल वाले के जुबां पर है, क्या वो अल्फ़ाज़ हो तुम,
जिसको कभी खोला ना जा सके, क्या वो राज़ हो तुम,
कितनी बार पूछ चुका हूँ तुमसे, फिर भी क्यों मौन हो तुम,
अब तो सच-सच बता दो यार कि ...
कौन हो तुम?
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©vikasgarg
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