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कभी अपने थे दोस्त था महबूब थी हर खुशी थी।

कभी अपने थे दोस्त था महबूब थी हर खुशी थी।

रूसवाईयों की आग में जलना पड़ता है

इश्क़ की इस राह से सबको गुजरना पड़ता है

उसे कैसे मालूम हो मुहब्बत का पाक एहसास

जिसे हर रोज़ नए बिस्तर से गुजरना पड़ता है

मैंने उसका ऐतबार किया बहुत इंतज़ार किया

अब तारिक-ए-शब में तन्हा भटकना पड़ता है

हालात दिवानों की कोई आशिक मिज़ाज ही जाने

किस क़दर टूट कर ग़म से बिखरना पड़ता है

कभी अपने थे दोस्त था महबूब थी हर खुशी थी

अब अनुराग को हर एक शय को तरसना पड़ता है।