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कभी-कभी मन करता है कि उम्र की सारी थकान उतार दूँ, और फिर से वही नन्ही-सी बच्ची…

कभी-कभी मन करता है कि उम्र की सारी थकान उतार दूँ, और फिर से वही नन्ही-सी बच्ची बन जाऊँ — जिसे दुनिया से नहीं, बस तुम्हारी बाँहों से मतलब हो।

तुम्हारी गोद में सिर रखूँ और समय वहीं ठहर जाए, ना कोई सवाल रहे, ना कोई डर, बस तुम्हारी साँसों की धीमी गर्माहट मेरे माथे को छूती रहे।

कितना अजीब है ना — मजबूत दिखते-दिखते अंदर का कोमल हिस्सा कितना थक जाता है। तब दिल चाहता है कोई बिना पूछे समझ ले, बिना बोले सुन ले, और बिना वजह अपने पास बिठा ले।

काश… तुम उँगलियों से मेरे बालों को धीरे-धीरे सुलझाते रहो, जैसे हर उलझन को चुपचाप खोल रहे हो, जैसे हर दर्द को नाम दिए बिना अपने अंदर समेट रहे हो।

मैं आँखें बंद कर लूँ, और दुनिया धुंधली हो जाए, बस तुम्हारी धड़कनों की आवाज़ मेरी नींद बन जाए।

कभी-कभी रोने का भी मन करता है — ज़ोर से नहीं, बस चुपचाप… तुम्हारी छाती से लगकर, ताकि आँसू गिरें और तुम बिना कुछ कहे उन्हें स्वीकार कर लो।

क्योंकि कुछ रिश्ते शब्द नहीं माँगते, सिर्फ़ एहसास चाहते हैं। कुछ प्यार इज़हार नहीं करते, बस सिर सहलाते हैं और टूटे हिस्सों को फिर से जीना सिखाते हैं।

उस पल में मैं ना बड़ी रहूँ, ना समझदार, ना मजबूत, ना संभली हुई — बस तुम्हारी हो जाऊँ पूरी तरह, एक मासूम सुकून बनकर।

और शायद उसी शांति में दिल धीरे से कहे — यही घर है, यही अपनापन है, यहीं कभी-कभी खुद बन जाने का मन करता है।

शिवन्या