कभी मेरे नजरों से भी नजरें मिला लेती
मेरे अश्कों से अपने दामन को भिंगा लेतीं ।
मुझसे क्या समझ कर फेर रहीं हो मुंह अब तक
बस दो लफ्ज़ कहकर जरा मुस्कुरा लेती।
हमें अब भी उन निगाहों से है इज़हार-ए-मुहब्बत
तू ही इज़हार-ए-मुहब्बत से अपना बना लेती।
मैं दुर बहुत दूर सबसे चला जाउंगा रानी
इक रोज के लिए अपने घर का मेहमां बना लेती।
खौफ है तुझे अपने धर्म के पहरेदारों का गर
प्यार से तुम हिंदू से अनुराग को मुसलमां बना लेती।
नहीं मानता मैं कोई धर्म इंसां धर्म के आगे
दिल में तू मेरे प्यार का इक अलख जला लेती।
©anuragrahi
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