कभी मेरी न हैसियत पुछो
कभी मेरी न तुम महरूमियत पुछो।
अगर पुछना ही है दिल-ए-जानां
तो दिल से मेरी कैफ़ियत पुछो।
लग जाए दाग जब दामन पर
तब जीने का अहमियत पुछो।
है इस चांद पर आज लगा ग्रहण
अभी बस खैरियत पुछो।
नाज़ुक दिल मेरा सब्र-ए-समीम बना है ये
बित रहा क्या इसपर वो अजियत पुछो।
क्यों अनुराग इस हद तक एक भरोसे पर जिंदा है
कभी एहतराम में मेरे मेरी शख्सियत पुछो।
©anuragrahi
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