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कभी राहगुज़र रहनुमा कहता है।

कभी राहगुज़र रहनुमा कहता है
गिराते आए हैं जो खाई में,खुद को खुदा कहता है।
बखूबी उन्हें अपनी जालसाजी पे फक्र है
इसे ही तो वो अपनी हुनर का अदा कहता है।
वैसे हर बात हर वादे पुरी हो जाए जरूरी नही
मगर मुझसे हर बात पर बार बार बाख़ुदा कहता है।
उन्हें औरों पे क्या खुद पे भी कभी ऐतबार नहीं
अपने आइने से हर एक को नाख़ुदा कहता है।
उसने पा लिया है जमाने में नफरत की उन उंचाईयों को
मगर अब भी अपने फर्ज की इब्तिदा कहता है।
©anuragrahi