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खामोश नहीं अब” – Women’s Day Spoken Word

खामोश नहीं अब” – Women’s Day Spoken Word
वो कहते हैं —

सिर ढक लो… अच्छा नहीं लगता।
आँखें झुका लो,
नज़रें मिलाना बदतमीज़ी कहलाता है।
होंठ सी लो अपने,
औरत को ज़्यादा बोलना शोभा नहीं देता।
सवाल मत करो,
तर्क करना तुम्हारे हिस्से की बात नहीं।
पीछे चलो हमारे,
बराबरी से चलना उन्हें मंज़ूर नहीं।
रोती रहो चुपचाप,
क्योंकि उन्हें औरत की हँसी भी चुभती है।
कहते हैं —
सपने छोटे देखो,
ऊँचा उड़ना तुम्हारे बस की बात नहीं।
सदियों से यही सुनती आई है औरत —
धीमे चलो…
धीमे बोलो…
धीमे जियो।
पर आज…
आज आवाज़ बदल रही है।
आज औरत कहती है —
मैं सिर नहीं झुकाऊँगी,
क्योंकि मेरी पहचान किसी परदे की मोहताज नहीं।
मैं नज़रें नहीं चुराऊँगी,
क्योंकि मेरी आँखों में भी वही आग है
जो इतिहास बदल देती है।
मैं खामोश नहीं रहूँगी,
क्योंकि मेरी आवाज़ दबाई जा सकती है,
मिटाई नहीं जा सकती।
मैं पीछे नहीं चलूँगी,
क्योंकि मैं रास्ता हूँ…
और मैं ही मंज़िल भी।
मैं आँसू नहीं, तूफ़ान हूँ।
मैं कमज़ोरी नहीं, एक क्रांति हूँ।
मैं वही औरत हूँ
जिसने ज़िंदगी को जन्म दिया,
और अब अपने सपनों को जन्म दे रही है।
आज का दिन सिर्फ़ जश्न नहीं —
एक ऐलान है।
कि अब औरत चुप नहीं रहेगी।
अब औरत झुकेगी नहीं।
क्योंकि
मैं औरत हूँ —
और मैं सिर्फ़ कहानी नहीं,
मैं बदलाव की शुरुआत हूँ।
✍️शिवन्या