नहीं रहे अब वो अरमां,
जल गए खाक हो गए
चीखती धरा पर ,
मेरी चीखती खामोशी,
उदास निहाई पर अब
भी वही राग गुनगुनाती है।
सूरज की उसी तेज़ चमक
में अब भी वो आईना ...
चमकाती है अपने हाथों से।
आसमां के उड़ते परिंदो से,
मेरी वो ख़ामोशी अब भी
बातें किया करती है।
©anusingh
A