माता-पिता की अरमान,
मेरे बचपन की जान,
देती थी होठो पर मुस्कान,
कहाँ है अब मेरी जान,
अब ना मक्का ना गेंहू खेत,
अब ना घर ना वो चौराहा,
टूटा अरमान बिखरा आसमां,
कहाँ है अब मेरी जान।
साथ मनाये होली रंगोली,
साथ खाए पुआ पकवान,
साथ खाए लाखों कसमें,
कहाँ है अब मेरी जान।
©ravicharan
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