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कहाँ कम है?

कहाँ कम है?

एकतरफ़ा ही सही, मगर इश्क़ मेरा कहाँ कम है?

तेरे दिल में ना सही, मेरे दिल में ये सनम कहाँ कम है?

तू बेख़बर रही मेरी, हर दुआ से हर दफ़ा,

मेरी हर एक दुआ में भी, नाम तेरा कहाँ कम है?

ये सच है कि बिन तेरे, अधूरी सी है ये ज़िंदगी,

मगर इस अधूरेपन में भी, असर तेरा कहाँ कम है?

तू मिले या ना मिले, कोई गिला-शिकवा नहीं है मुझे,

तुझे शिद्दत से चाहने में भी, इबादत मेरी कहाँ कम है?

मेरे एकतरफ़ा इश्क़ को तू सनम, हल्के में मत समझ,

ये मोहब्बत किसी मुकम्मल मोहब्बत से कहाँ कम है?

© विशाल सैनी