खड़ा है दर्द दिल में एक पां पर पहाड़ की तरह।
चला जाए उम्र भर के लिए ये ख़ाकसारी अपनी
गर कर दे कोई मेरे तरफ़ मेहरबानी अपनी
मैं हर बार शिकस्त पा कर भी हार नहीं माना
कुछ इस तरह है बुर्दबारी अपनी
इल्तज़ा है ऐ हसिनों हमसे भी ज़रा निगाहें मिलाओ
कुछ दिन ही और रहेगी इश्क़ की ख़ुमारी अपनी
खड़ा है दर्द दिल में एक पां पर पहाड़ की तरह
जबसे देखा है तुझे तब से है ये बिमारी अपनी
तुम दर-ए-अनुराग छोड़ कर कहां भटक रही हो
आओ लौट आओ ये घर भी है तुम्हारी अपनी।