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खोई खोई सी नग्मा हो तुम मेरे प्यार का।

खोई खोई सी नग्मा हो तुम मेरे प्यार का
कभी दिल से पुछ लिया करो हाल दिल-ए-यार का ।
इबादत-ए-रमजान जो कल शुरू हो रही है
महका दो आज दामन भी मेरे दयार का।
इश्क ही इबादत इश्क़ ही है मजहब मेरा
मौका तो दो इक बार सुरत-ए-चांद के दिदार का।
हर बार माह-ए-रमजान में तन्हा रहा हूं मैं
इस बार तो दे दो दावत संग इफ्तार का।
मैं हिन्दू और तुम मुस्लिम उठेगा जरूर इक दिन
मसला बनके हम दोनों पर आजार का।
मगर ऐतबार रखना मुझ पर कभी मायुस न होना
क्या कर लेंगे वो भौंकते कुत्ते हमें बाजार का।
©anuragrahi